राष्ट्रीय चलन दिव्यांगजन संस्थान (दिव्यांगजन) National Institute for Locomotor Disabilities (Divyangjan) – NILD | RPSC First Grade Special Education Notes
राष्ट्रीय चलन दिव्यांगजन संस्थान (दिव्यांगजन) [National Institute for Locomotor Disabilities (Divyangjan) – NILD] भारत सरकार के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के अंतर्गत दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग (Department of Empowerment of Persons with Disabilities – DEPwD) द्वारा संचालित एक प्रमुख राष्ट्रीय स्वायत्त संस्थान (Autonomous National Institute) है।
यह संस्थान चलन दिव्यांगता (Locomotor Disability), अस्थि एवं मांसपेशीय विकार (Orthopaedic Disabilities), सेरेब्रल पाल्सी (Cerebral Palsy) तथा अन्य शारीरिक दिव्यांगताओं से संबंधित शिक्षा, पुनर्वास, अनुसंधान, प्रशिक्षण, मानव संसाधन विकास तथा सहायक उपकरणों के विकास के क्षेत्र में भारत का प्रमुख राष्ट्रीय संस्थान है।
NILD का उद्देश्य चलन दिव्यांग व्यक्तियों को केवल चिकित्सकीय सेवाएँ उपलब्ध कराना नहीं है, बल्कि उन्हें शिक्षा, पुनर्वास, कौशल विकास, रोजगार तथा सामाजिक जीवन में समान अवसर प्रदान करके आत्मनिर्भर बनाना भी है।
यह संस्थान विशेष शिक्षा, फिजियोथेरेपी, ऑक्यूपेशनल थेरेपी, कृत्रिम अंग एवं ऑर्थोसिस (Prosthetics and Orthotics), पुनर्वास अभियांत्रिकी (Rehabilitation Engineering), व्यावसायिक प्रशिक्षण तथा समावेशी शिक्षा के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
चलन दिव्यांगता (Locomotor Disability) का अर्थ
चलन दिव्यांगता (Locomotor Disability) ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति की हड्डियों, जोड़ों, मांसपेशियों, तंत्रिकाओं अथवा अंगों में ऐसी स्थायी समस्या उत्पन्न हो जाती है जिससे उसकी चलने-फिरने, वस्तुओं को पकड़ने, बैठने, खड़े होने अथवा दैनिक गतिविधियाँ करने की क्षमता प्रभावित होती है।
दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के अनुसार चलन दिव्यांगता को मान्यता प्राप्त दिव्यांगताओं में शामिल किया गया है।
चलन दिव्यांगता अनेक कारणों से हो सकती है, जैसे—
- पोलियो के प्रभाव
- सेरेब्रल पाल्सी
- रीढ़ की हड्डी की चोट (Spinal Cord Injury)
- अंग विच्छेदन (Amputation)
- जन्मजात विकृतियाँ (Congenital Deformities)
- दुर्घटनाएँ
- मस्कुलर डिस्ट्रॉफी
- अस्थि एवं जोड़ संबंधी विकार
इन व्यक्तियों को चिकित्सा, पुनर्वास, विशेष शिक्षा, सहायक उपकरण तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। NILD इन्हीं सभी क्षेत्रों में राष्ट्रीय स्तर पर कार्य करता है।
संस्थान का इतिहास
भारत में चलन दिव्यांग व्यक्तियों के लिए संगठित पुनर्वास सेवाओं की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही थी। विशेष रूप से स्वतंत्रता के बाद पोलियो, दुर्घटनाओं तथा अन्य शारीरिक विकारों के कारण बड़ी संख्या में लोग चलन दिव्यांगता से प्रभावित हुए।
इन व्यक्तियों के लिए कृत्रिम अंग, कैलिपर, व्हीलचेयर, पुनर्वास सेवाएँ तथा विशेष प्रशिक्षण की पर्याप्त व्यवस्था उपलब्ध नहीं थी।
इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 1978 में National Institute for the Orthopaedically Handicapped (NIOH) की स्थापना कोलकाता (पश्चिम बंगाल) में की।
बाद में दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की भावना के अनुरूप संस्थान का नाम बदलकर National Institute for Locomotor Disabilities (Divyangjan) – NILD कर दिया गया।
आज यह संस्थान चलन दिव्यांगता के क्षेत्र में शिक्षा, अनुसंधान, प्रशिक्षण, कृत्रिम अंग निर्माण, पुनर्वास तथा मानव संसाधन विकास का प्रमुख राष्ट्रीय केंद्र है।
स्थापना संबंधी महत्वपूर्ण तथ्य
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| आधिकारिक नाम | राष्ट्रीय चलन दिव्यांगजन संस्थान (दिव्यांगजन) |
| अंग्रेज़ी नाम | National Institute for Locomotor Disabilities (Divyangjan) |
| संक्षिप्त नाम | NILD |
| पूर्व नाम | National Institute for the Orthopaedically Handicapped (NIOH) |
| स्थापना वर्ष | 1978 |
| मुख्यालय | कोलकाता, पश्चिम बंगाल |
| प्रशासनिक नियंत्रण | दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग (DEPwD), सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार |
| संस्थान का स्वरूप | स्वायत्त राष्ट्रीय संस्थान |
परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य:
NILD का पूर्व नाम National Institute for the Orthopaedically Handicapped (NIOH) था। प्रतियोगी परीक्षाओं में यह तथ्य अक्सर पूछा जाता है।
संस्थान की स्थापना की आवश्यकता
NILD की स्थापना निम्नलिखित आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर की गई—
चलन दिव्यांग व्यक्तियों के लिए समग्र पुनर्वास
चलन दिव्यांग व्यक्तियों को चिकित्सा, फिजियोथेरेपी, कृत्रिम अंग, विशेष शिक्षा तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण जैसी अनेक सेवाओं की आवश्यकता होती है। इन सभी सेवाओं को एक ही संस्थान में उपलब्ध कराने के उद्देश्य से NILD की स्थापना की गई।
विशेष शिक्षकों एवं पुनर्वास विशेषज्ञों का प्रशिक्षण
देश में चलन दिव्यांगता के क्षेत्र में प्रशिक्षित विशेष शिक्षकों एवं पुनर्वास विशेषज्ञों की कमी थी। इस कमी को दूर करने के लिए संस्थान में विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रारम्भ किए गए।
कृत्रिम अंग एवं सहायक उपकरणों का विकास
चलन दिव्यांग व्यक्तियों के लिए कृत्रिम अंग (Prosthesis), ऑर्थोसिस (Orthosis), व्हीलचेयर, वॉकर तथा अन्य सहायक उपकरणों के विकास एवं उपयोग को बढ़ावा देना संस्थान की स्थापना का एक प्रमुख उद्देश्य था।
अनुसंधान एवं नवाचार
संस्थान चलन दिव्यांगता, पुनर्वास अभियांत्रिकी, कृत्रिम अंग निर्माण तथा पुनर्वास तकनीकों के क्षेत्र में अनुसंधान एवं नवाचार को प्रोत्साहित करता है।
समावेशी शिक्षा को तकनीकी सहयोग
NILD सामान्य विद्यालयों, विशेष विद्यालयों तथा राज्य सरकारों को तकनीकी सहायता प्रदान करता है ताकि चलन दिव्यांग बच्चे भी गुणवत्तापूर्ण एवं समावेशी शिक्षा प्राप्त कर सकें।
संस्थान का दृष्टिकोण (Vision)
ऐसा समावेशी समाज विकसित करना जहाँ चलन दिव्यांग व्यक्ति शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार एवं सामाजिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में समान अवसर प्राप्त कर सकें तथा आत्मनिर्भर जीवन व्यतीत कर सकें।
संस्थान का मिशन (Mission)
चलन दिव्यांग व्यक्तियों को शिक्षा, पुनर्वास, अनुसंधान, सहायक प्रौद्योगिकी, कृत्रिम अंग, प्रशिक्षण तथा सामुदायिक सहभागिता के माध्यम से सशक्त बनाना एवं उनके जीवन की गुणवत्ता में सुधार करना।
संस्थान के प्रमुख उद्देश्य
NILD निम्नलिखित प्रमुख उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कार्य करता है—
- चलन दिव्यांग व्यक्तियों का समग्र पुनर्वास।
- गुणवत्तापूर्ण विशेष शिक्षा उपलब्ध कराना।
- फिजियोथेरेपी एवं ऑक्यूपेशनल थेरेपी सेवाओं का विस्तार।
- कृत्रिम अंग एवं ऑर्थोसिस का विकास।
- विशेष शिक्षकों एवं पुनर्वास विशेषज्ञों का प्रशिक्षण।
- अनुसंधान एवं नवाचार को प्रोत्साहित करना।
- सहायक उपकरणों के उपयोग को बढ़ावा देना।
- परिवार एवं समुदाय को प्रशिक्षण देना।
- समावेशी शिक्षा के लिए तकनीकी सहयोग प्रदान करना।
- दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाना।
NILD की कार्य-दर्शन (Core Philosophy)
NILD का मूल सिद्धांत है कि उचित चिकित्सा, पुनर्वास, शिक्षा, सहायक उपकरण एवं प्रशिक्षण के माध्यम से चलन दिव्यांग व्यक्ति आत्मनिर्भर एवं सम्मानजनक जीवन जी सकता है।
संस्थान बहुविषयक टीम दृष्टिकोण (Multidisciplinary Team Approach) अपनाता है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसकी आवश्यकताओं के अनुसार पुनर्वास योजना तैयार की जाती है।
बहुविषयक टीम (Multidisciplinary Team)
संस्थान में विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ मिलकर कार्य करते हैं।
इस टीम में सामान्यतः निम्नलिखित विशेषज्ञ शामिल होते हैं—
- विशेष शिक्षक
- अस्थि रोग विशेषज्ञ (Orthopaedic Surgeon)
- फिजियोथेरेपिस्ट
- ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट
- ऑर्थोटिस्ट एवं प्रोस्थेटिस्ट
- पुनर्वास मनोवैज्ञानिक
- सामाजिक कार्यकर्ता
- पुनर्वास अभियंता (Rehabilitation Engineer)
- व्यावसायिक प्रशिक्षक
सभी विशेषज्ञ मिलकर प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकताओं के अनुसार व्यक्तिकृत पुनर्वास योजना (Individualized Rehabilitation Plan – IRP) तैयार करते हैं।
विशेष शिक्षा में NILD का महत्व
भारत में चलन दिव्यांगता के क्षेत्र में विशेष शिक्षा एवं पुनर्वास व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में NILD का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
इस संस्थान ने—
- चलन दिव्यांग बच्चों के लिए विशेष शिक्षण मॉडल विकसित किए।
- विशेष शिक्षकों एवं पुनर्वास विशेषज्ञों को प्रशिक्षित किया।
- कृत्रिम अंग एवं ऑर्थोसिस सेवाओं का विस्तार किया।
- फिजियोथेरेपी एवं ऑक्यूपेशनल थेरेपी को पुनर्वास का अभिन्न भाग बनाया।
- समावेशी शिक्षा के लिए तकनीकी सहयोग प्रदान किया।
- पुनर्वास अभियांत्रिकी के क्षेत्र में अनुसंधान को बढ़ावा दिया।
- सहायक उपकरणों के विकास एवं उपयोग में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
राष्ट्रीय चलन दिव्यांगजन संस्थान (दिव्यांगजन) [NILD] की संगठनात्मक संरचना
राष्ट्रीय चलन दिव्यांगजन संस्थान (दिव्यांगजन) [NILD] एक बहुविषयक (Multidisciplinary) एवं समग्र पुनर्वास (Comprehensive Rehabilitation) मॉडल पर कार्य करने वाला राष्ट्रीय संस्थान है। संस्थान में चिकित्सा, शिक्षा, पुनर्वास, अनुसंधान, प्रशिक्षण तथा सहायक प्रौद्योगिकी से संबंधित विभिन्न विभाग समन्वित रूप से कार्य करते हैं।
संस्थान का उद्देश्य केवल उपचार प्रदान करना नहीं है, बल्कि चलन दिव्यांग व्यक्तियों को शारीरिक, शैक्षिक, सामाजिक तथा व्यावसायिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना भी है। इसी कारण संस्थान में विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ मिलकर व्यक्ति की आवश्यकताओं के अनुसार व्यापक पुनर्वास सेवाएँ प्रदान करते हैं।
संस्थान के प्रमुख विभाग
NILD में अनेक विशेषज्ञ विभाग कार्यरत हैं। प्रत्येक विभाग अपनी विशिष्ट भूमिका निभाता है तथा अन्य विभागों के साथ समन्वय स्थापित करके पुनर्वास सेवाएँ प्रदान करता है।
संस्थान के प्रमुख विभाग निम्नलिखित हैं—
- विशेष शिक्षा विभाग (Department of Special Education)
- फिजियोथेरेपी विभाग (Department of Physiotherapy)
- ऑक्यूपेशनल थेरेपी विभाग (Department of Occupational Therapy)
- प्रोस्थेटिक्स एवं ऑर्थोटिक्स विभाग (Department of Prosthetics and Orthotics)
- पुनर्वास अभियांत्रिकी विभाग (Department of Rehabilitation Engineering)
- ऑर्थोपेडिक चिकित्सा विभाग
- मनोविज्ञान विभाग
- सामाजिक कार्य विभाग
- व्यावसायिक पुनर्वास विभाग
- अनुसंधान एवं विकास विभाग
- प्रशिक्षण एवं मानव संसाधन विकास विभाग
इन सभी विभागों का उद्देश्य चलन दिव्यांग व्यक्तियों के लिए गुणवत्तापूर्ण एवं समग्र पुनर्वास सेवाएँ उपलब्ध कराना है।
NILD द्वारा प्रदान की जाने वाली प्रमुख सेवाएँ
संस्थान में चलन दिव्यांग व्यक्तियों के लिए विभिन्न प्रकार की सेवाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं। इन सेवाओं का उद्देश्य व्यक्ति की कार्यात्मक क्षमता बढ़ाना, आत्मनिर्भरता विकसित करना तथा सामाजिक सहभागिता सुनिश्चित करना है।
संस्थान द्वारा प्रदान की जाने वाली प्रमुख सेवाएँ निम्नलिखित हैं—
- चिकित्सकीय मूल्यांकन
- फिजियोथेरेपी
- ऑक्यूपेशनल थेरेपी
- कृत्रिम अंग (Prosthesis) सेवाएँ
- ऑर्थोसिस (Orthosis) सेवाएँ
- विशेष शिक्षा
- मनोवैज्ञानिक परामर्श
- व्यावसायिक पुनर्वास
- सहायक उपकरणों का मूल्यांकन
- परिवार परामर्श
- सामुदायिक पुनर्वास
- समावेशी शिक्षा के लिए तकनीकी सहयोग
चिकित्सकीय मूल्यांकन (Medical Assessment)
पुनर्वास प्रक्रिया का पहला चरण व्यक्ति की स्थिति का समग्र मूल्यांकन करना होता है।
संस्थान के विशेषज्ञ निम्नलिखित पहलुओं का विस्तृत मूल्यांकन करते हैं—
- शारीरिक कार्यक्षमता
- मांसपेशियों की शक्ति
- जोड़ों की गतिशीलता
- चलने-फिरने की क्षमता
- संतुलन
- कार्यात्मक स्वतंत्रता
- सहायक उपकरणों की आवश्यकता
मूल्यांकन के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति के लिए व्यक्तिगत पुनर्वास योजना तैयार की जाती है।
फिजियोथेरेपी (Physiotherapy)
फिजियोथेरेपी NILD की प्रमुख सेवाओं में से एक है। इसका उद्देश्य चलन दिव्यांग व्यक्तियों की शारीरिक क्षमता, संतुलन, गतिशीलता तथा मांसपेशियों की कार्यक्षमता में सुधार करना है।
फिजियोथेरेपी के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं—
- मांसपेशियों की शक्ति बढ़ाना।
- शरीर का संतुलन विकसित करना।
- जोड़ों की गतिशीलता बनाए रखना।
- चलने-फिरने की क्षमता में सुधार करना।
- दर्द को कम करना।
- विकृतियों (Deformities) की रोकथाम करना।
- स्वतंत्र गतिशीलता को बढ़ावा देना।
फिजियोथेरेपी में उपयोग की जाने वाली प्रमुख तकनीकें
संस्थान में व्यक्ति की आवश्यकता के अनुसार विभिन्न तकनीकों का उपयोग किया जाता है—
- चिकित्सीय व्यायाम (Therapeutic Exercises)
- संतुलन प्रशिक्षण
- चाल प्रशिक्षण (Gait Training)
- मांसपेशी सुदृढ़ीकरण (Muscle Strengthening)
- स्ट्रेचिंग व्यायाम
- स्थिति प्रबंधन (Positioning)
- कार्यात्मक गतिविधियों का अभ्यास
इन तकनीकों का उद्देश्य व्यक्ति की अधिकतम कार्यात्मक क्षमता विकसित करना है।
ऑक्यूपेशनल थेरेपी (Occupational Therapy)
ऑक्यूपेशनल थेरेपी का उद्देश्य व्यक्ति को दैनिक जीवन की गतिविधियों में अधिकतम स्वतंत्र बनाना है।
चलन दिव्यांग व्यक्तियों को अनेक दैनिक कार्यों में कठिनाई होती है, जैसे—
- कपड़े पहनना
- भोजन करना
- लिखना
- स्नान करना
- वस्तुएँ उठाना
- व्यक्तिगत स्वच्छता बनाए रखना
ऑक्यूपेशनल थेरेपी के माध्यम से इन सभी गतिविधियों में सुधार लाने का प्रयास किया जाता है।
ऑक्यूपेशनल थेरेपी के प्रमुख उद्देश्य
- दैनिक जीवन कौशल (Activities of Daily Living – ADL) विकसित करना।
- हाथों की कार्यक्षमता बढ़ाना।
- सूक्ष्म मोटर कौशल (Fine Motor Skills) विकसित करना।
- हाथ-आँख समन्वय में सुधार करना।
- कार्यात्मक स्वतंत्रता बढ़ाना।
- सहायक उपकरणों का प्रभावी उपयोग सिखाना।
कृत्रिम अंग (Prosthetics)
प्रोस्थेसिस (Prosthesis) कृत्रिम अंग होते हैं, जिनका उपयोग उन व्यक्तियों के लिए किया जाता है जिनका कोई अंग जन्मजात कारणों अथवा दुर्घटना, बीमारी या शल्य चिकित्सा के कारण अनुपस्थित हो।
NILD कृत्रिम अंगों के निर्माण, चयन, फिटिंग तथा उपयोग का प्रशिक्षण प्रदान करता है।
कृत्रिम अंगों के प्रमुख उद्देश्य हैं—
- चलने-फिरने की क्षमता बढ़ाना।
- कार्यात्मक स्वतंत्रता विकसित करना।
- दैनिक जीवन की गतिविधियों में सहायता करना।
- आत्मविश्वास बढ़ाना।
- सामाजिक एवं व्यावसायिक सहभागिता में सुधार करना।
ऑर्थोसिस (Orthosis)
ऑर्थोसिस (Orthosis) ऐसे सहायक उपकरण हैं जो शरीर के किसी अंग को सहारा देने, स्थिर रखने अथवा उसकी कार्यक्षमता में सुधार करने के लिए उपयोग किए जाते हैं।
उदाहरण—
- कैलिपर
- एंकल-फुट ऑर्थोसिस (AFO)
- नी-एंकल-फुट ऑर्थोसिस (KAFO)
- स्पाइनल ऑर्थोसिस
- हाथ एवं कलाई के स्प्लिंट
NILD आवश्यकता के अनुसार इन उपकरणों का मूल्यांकन, निर्माण, फिटिंग तथा प्रशिक्षण प्रदान करता है।
पुनर्वास अभियांत्रिकी (Rehabilitation Engineering)
पुनर्वास अभियांत्रिकी NILD की एक महत्वपूर्ण विशेषता है।
इस क्षेत्र में इंजीनियरिंग सिद्धांतों का उपयोग करके ऐसे उपकरण विकसित किए जाते हैं जो दिव्यांग व्यक्तियों की कार्यात्मक क्षमता एवं स्वतंत्रता को बढ़ाते हैं।
पुनर्वास अभियांत्रिकी के प्रमुख कार्य—
- सहायक उपकरणों का विकास।
- उपकरणों का अनुकूलन (Customization)।
- व्हीलचेयर मॉडिफिकेशन।
- विशेष बैठने की व्यवस्था (Adaptive Seating)।
- गतिशीलता उपकरणों का विकास।
- कंप्यूटर आधारित सहायक तकनीक का उपयोग।
सहायक उपकरणों का मूल्यांकन
प्रत्येक चलन दिव्यांग व्यक्ति की आवश्यकताएँ अलग-अलग होती हैं।
इसलिए NILD में विशेषज्ञ पहले व्यक्ति का विस्तृत मूल्यांकन करते हैं और उसके बाद उपयुक्त उपकरण का चयन करते हैं।
मूल्यांकन के दौरान निम्नलिखित बातों पर ध्यान दिया जाता है—
- दिव्यांगता का प्रकार।
- आयु।
- शारीरिक क्षमता।
- दैनिक जीवन की आवश्यकताएँ।
- विद्यालय या कार्यस्थल की परिस्थितियाँ।
- सामाजिक वातावरण।
मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक सेवाएँ
चलन दिव्यांगता केवल शारीरिक समस्या नहीं होती, बल्कि इसका प्रभाव व्यक्ति के आत्मविश्वास, सामाजिक संबंधों तथा मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है।
इसी कारण NILD में मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक सेवाएँ भी उपलब्ध कराई जाती हैं।
इन सेवाओं में शामिल हैं—
- मनोवैज्ञानिक परामर्श।
- व्यवहारिक सहयोग।
- परिवार परामर्श।
- सामाजिक समायोजन।
- व्यावसायिक मार्गदर्शन।
- भावनात्मक सहयोग।
व्यावसायिक पुनर्वास (Vocational Rehabilitation)
चलन दिव्यांग व्यक्तियों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना पुनर्वास का महत्वपूर्ण उद्देश्य है।
संस्थान विभिन्न प्रकार के व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करता है ताकि व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार रोजगार अथवा स्वरोजगार प्राप्त कर सके।
व्यावसायिक पुनर्वास के अंतर्गत—
- कौशल मूल्यांकन।
- व्यावसायिक प्रशिक्षण।
- रोजगार परामर्श।
- स्वरोजगार संबंधी मार्गदर्शन।
- कार्यस्थल अनुकूलन।
जैसी सेवाएँ प्रदान की जाती हैं।
परिवार परामर्श
परिवार चलन दिव्यांग व्यक्ति के पुनर्वास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
संस्थान अभिभावकों एवं परिवार के सदस्यों को निम्नलिखित विषयों पर प्रशिक्षण देता है—
- घर पर व्यायाम कैसे कराएँ।
- सहायक उपकरणों का सही उपयोग।
- दैनिक जीवन कौशल विकसित करना।
- विद्यालयी सहयोग।
- सामाजिक समायोजन।
- सरकारी योजनाओं एवं सुविधाओं की जानकारी।
विशेष शिक्षा में NILD का योगदान
राष्ट्रीय चलन दिव्यांगजन संस्थान ने भारत में चलन दिव्यांगता के क्षेत्र में विशेष शिक्षा एवं पुनर्वास सेवाओं को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
संस्थान ने—
- विशेष शिक्षकों का प्रशिक्षण सुदृढ़ किया।
- फिजियोथेरेपी एवं ऑक्यूपेशनल थेरेपी को विशेष शिक्षा से जोड़ा।
- कृत्रिम अंग एवं ऑर्थोसिस सेवाओं का विस्तार किया।
- पुनर्वास अभियांत्रिकी को बढ़ावा दिया।
- समावेशी शिक्षा के लिए तकनीकी सहायता प्रदान की।
- चलन दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए उपयुक्त शिक्षण वातावरण विकसित करने में योगदान दिया।
परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य
- संक्षिप्त नाम – NILD
- पूर्व नाम – National Institute for the Orthopaedically Handicapped (NIOH)
- स्थापना वर्ष – 1978
- मुख्यालय – कोलकाता, पश्चिम बंगाल
- प्रमुख कार्यक्षेत्र – चलन दिव्यांगता (Locomotor Disability)
- विशेष सेवाएँ – फिजियोथेरेपी, ऑक्यूपेशनल थेरेपी, प्रोस्थेटिक्स, ऑर्थोटिक्स, पुनर्वास अभियांत्रिकी एवं विशेष शिक्षा
NILD द्वारा संचालित शैक्षणिक कार्यक्रम
राष्ट्रीय चलन दिव्यांगजन संस्थान (दिव्यांगजन) [NILD] का प्रमुख उद्देश्य चलन दिव्यांगता के क्षेत्र में योग्य एवं प्रशिक्षित मानव संसाधन तैयार करना है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए संस्थान विशेष शिक्षा, फिजियोथेरेपी, ऑक्यूपेशनल थेरेपी, प्रोस्थेटिक्स एवं ऑर्थोटिक्स, पुनर्वास विज्ञान तथा अन्य संबद्ध क्षेत्रों में विभिन्न शैक्षणिक एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित करता है।
इन कार्यक्रमों का संचालन भारतीय पुनर्वास परिषद् (Rehabilitation Council of India – RCI) के मानकों एवं दिशा-निर्देशों के अनुसार किया जाता है। कई शैक्षणिक कार्यक्रम संबंधित विश्वविद्यालयों से संबद्ध (Affiliated) भी होते हैं। समय-समय पर आवश्यकता एवं नीतिगत परिवर्तनों के अनुरूप इन पाठ्यक्रमों में संशोधन किया जाता है।
शैक्षणिक कार्यक्रमों के प्रमुख उद्देश्य
संस्थान द्वारा संचालित शैक्षणिक कार्यक्रमों का उद्देश्य ऐसे दक्ष एवं संवेदनशील पुनर्वास पेशेवर तैयार करना है जो चलन दिव्यांग व्यक्तियों की शैक्षणिक, चिकित्सकीय, सामाजिक एवं व्यावसायिक आवश्यकताओं को समझते हुए प्रभावी सेवाएँ प्रदान कर सकें।
इन कार्यक्रमों के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं—
- चलन दिव्यांगता के क्षेत्र में प्रशिक्षित विशेष शिक्षक तैयार करना।
- पुनर्वास विशेषज्ञों का विकास करना।
- फिजियोथेरेपी एवं ऑक्यूपेशनल थेरेपी के क्षेत्र में दक्ष पेशेवर तैयार करना।
- प्रोस्थेटिक्स एवं ऑर्थोटिक्स विशेषज्ञों का प्रशिक्षण।
- समावेशी शिक्षा के लिए योग्य मानव संसाधन उपलब्ध कराना।
- अनुसंधान एवं नवाचार को बढ़ावा देना।
- पुनर्वास सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार करना।
RCI मान्यता प्राप्त प्रशिक्षण कार्यक्रम
NILD समय-समय पर RCI द्वारा मान्यता प्राप्त विभिन्न दीर्घकालीन (Long-Term) एवं अल्पकालीन (Short-Term) प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित करता है।
इन कार्यक्रमों का उद्देश्य निम्नलिखित क्षेत्रों में विशेषज्ञ तैयार करना है—
- विशेष शिक्षा (चलन दिव्यांगता)
- फिजियोथेरेपी
- ऑक्यूपेशनल थेरेपी
- प्रोस्थेटिक्स एवं ऑर्थोटिक्स
- पुनर्वास विज्ञान
- समावेशी शिक्षा
- सहायक प्रौद्योगिकी
- क्षमता निर्माण (Capacity Building)
इसके अतिरिक्त संस्थान विभिन्न कार्यशालाएँ, संगोष्ठियाँ, अल्पकालीन प्रशिक्षण कार्यक्रम तथा सतत पुनर्वास शिक्षा (Continuing Rehabilitation Education – CRE) कार्यक्रम भी आयोजित करता है।
परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य:
RPSC परीक्षा में यह पूछा जा सकता है कि NILD चलन दिव्यांगता के क्षेत्र में RCI मान्यता प्राप्त प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित करने वाला राष्ट्रीय संस्थान है।
सतत पुनर्वास शिक्षा (Continuing Rehabilitation Education – CRE)
विशेष शिक्षा एवं पुनर्वास के क्षेत्र में नई तकनीकों, शोध एवं उपचार पद्धतियों का निरंतर विकास हो रहा है। इसलिए कार्यरत पुनर्वास विशेषज्ञों एवं विशेष शिक्षकों के ज्ञान एवं कौशल को अद्यतन बनाए रखने के लिए NILD नियमित रूप से CRE कार्यक्रम आयोजित करता है।
इन कार्यक्रमों में निम्नलिखित विषयों पर प्रशिक्षण दिया जाता है—
- आधुनिक पुनर्वास तकनीकें।
- समावेशी शिक्षा।
- सहायक उपकरणों का प्रभावी उपयोग।
- IEP का निर्माण एवं क्रियान्वयन।
- फिजियोथेरेपी की नवीन तकनीकें।
- ऑक्यूपेशनल थेरेपी।
- पुनर्वास अभियांत्रिकी।
- दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016।
इन कार्यक्रमों से पुनर्वास पेशेवरों की कार्यकुशलता एवं व्यावसायिक क्षमता में वृद्धि होती है।
अनुसंधान एवं विकास (Research and Development)
NILD चलन दिव्यांगता के क्षेत्र में अनुसंधान एवं नवाचार को विशेष महत्व देता है। संस्थान का उद्देश्य ऐसे वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक समाधान विकसित करना है जो दिव्यांग व्यक्तियों की कार्यात्मक क्षमता तथा जीवन की गुणवत्ता में सुधार कर सकें।
अनुसंधान के प्रमुख क्षेत्र
संस्थान निम्नलिखित विषयों पर अनुसंधान करता है—
- चलन दिव्यांगता का मूल्यांकन।
- पुनर्वास अभियांत्रिकी।
- फिजियोथेरेपी।
- ऑक्यूपेशनल थेरेपी।
- प्रोस्थेटिक्स एवं ऑर्थोटिक्स।
- सहायक प्रौद्योगिकी।
- समावेशी शिक्षा।
- व्यावसायिक पुनर्वास।
- कार्यात्मक स्वतंत्रता।
- पुनर्वास परिणामों का मूल्यांकन।
अनुसंधान के प्रमुख उद्देश्य
संस्थान के अनुसंधान कार्यक्रमों के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं—
- नई पुनर्वास तकनीकों का विकास।
- आधुनिक सहायक उपकरणों का निर्माण।
- विशेष शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार।
- कृत्रिम अंग एवं ऑर्थोसिस की उपयोगिता बढ़ाना।
- पुनर्वास सेवाओं की प्रभावशीलता का मूल्यांकन।
- राष्ट्रीय नीतियों एवं योजनाओं को तकनीकी सहयोग प्रदान करना।
प्रोस्थेटिक्स एवं ऑर्थोटिक्स के क्षेत्र में योगदान
NILD भारत में प्रोस्थेटिक्स (Prosthetics) एवं ऑर्थोटिक्स (Orthotics) के क्षेत्र में अग्रणी संस्थानों में से एक है।
संस्थान द्वारा निम्नलिखित कार्य किए जाते हैं—
- कृत्रिम अंगों का डिज़ाइन एवं विकास।
- ऑर्थोसिस का निर्माण।
- व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुसार उपकरणों का अनुकूलन।
- उपकरणों की फिटिंग।
- उपकरणों के उपयोग का प्रशिक्षण।
- नियमित अनुवर्ती सेवाएँ (Follow-up Services)।
इन सेवाओं का उद्देश्य चलन दिव्यांग व्यक्तियों को अधिकतम कार्यात्मक स्वतंत्रता प्रदान करना है।
पुनर्वास अभियांत्रिकी (Rehabilitation Engineering)
पुनर्वास अभियांत्रिकी NILD की प्रमुख विशेषताओं में से एक है।
इस क्षेत्र में इंजीनियरिंग सिद्धांतों का उपयोग करके ऐसे उपकरण एवं तकनीक विकसित किए जाते हैं जो दिव्यांग व्यक्तियों की स्वतंत्रता एवं कार्यक्षमता को बढ़ाते हैं।
पुनर्वास अभियांत्रिकी के प्रमुख कार्य—
- सहायक उपकरणों का विकास।
- व्हीलचेयर डिज़ाइन एवं अनुकूलन।
- विशेष बैठने की व्यवस्था (Adaptive Seating Systems)।
- गतिशीलता उपकरणों का विकास।
- कंप्यूटर आधारित सहायक तकनीक।
- कार्यस्थल अनुकूलन।
मानव संसाधन विकास (Human Resource Development)
NILD ने भारत में चलन दिव्यांगता के क्षेत्र में प्रशिक्षित मानव संसाधन तैयार करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
संस्थान द्वारा प्रशिक्षित विशेषज्ञ निम्नलिखित संस्थानों में कार्यरत हैं—
- विशेष विद्यालय।
- समावेशी विद्यालय।
- अस्पताल।
- पुनर्वास केंद्र।
- विश्वविद्यालय।
- सरकारी संस्थान।
- गैर-सरकारी संगठन।
- कृत्रिम अंग निर्माण केंद्र।
इन विशेषज्ञों ने देश में पुनर्वास सेवाओं की गुणवत्ता को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
प्रकाशन (Publications)
NILD समय-समय पर चलन दिव्यांगता एवं पुनर्वास से संबंधित विभिन्न प्रकार की अध्ययन सामग्री एवं प्रकाशन प्रकाशित करता है।
इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं—
- प्रशिक्षण मॉड्यूल।
- शिक्षक मार्गदर्शिकाएँ।
- पुनर्वास पुस्तिकाएँ।
- शोध रिपोर्ट।
- सहायक उपकरण उपयोग पुस्तिका।
- अभिभावक मार्गदर्शिका।
- जागरूकता साहित्य।
- विशेष शिक्षा संबंधी अध्ययन सामग्री।
इन प्रकाशनों का उपयोग विशेष शिक्षकों, विद्यार्थियों, पुनर्वास विशेषज्ञों तथा शोधार्थियों द्वारा किया जाता है।
समावेशी शिक्षा में NILD का योगदान
राष्ट्रीय शिक्षा नीति एवं समावेशी शिक्षा के प्रभावी क्रियान्वयन में NILD का महत्वपूर्ण योगदान है।
संस्थान निम्नलिखित क्षेत्रों में तकनीकी सहयोग प्रदान करता है—
- सामान्य विद्यालयों के शिक्षकों का प्रशिक्षण।
- विद्यालयों में सुगम्यता (Accessibility) संबंधी मार्गदर्शन।
- चलन दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए IEP तैयार करने में सहयोग।
- सहायक उपकरणों के उपयोग का प्रशिक्षण।
- कक्षा एवं विद्यालय वातावरण का अनुकूलन।
- पाठ्यक्रम अनुकूलन।
- अभिभावकों एवं विद्यालयों को परामर्श सेवाएँ।
इन प्रयासों के कारण चलन दिव्यांग विद्यार्थियों की शिक्षा में सहभागिता एवं उपलब्धियों में वृद्धि हुई है।
NILD की प्रमुख उपलब्धियाँ
स्थापना के बाद से NILD ने अनेक महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं—
- चलन दिव्यांगता के क्षेत्र में राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र के रूप में पहचान स्थापित की।
- प्रोस्थेटिक्स एवं ऑर्थोटिक्स सेवाओं का विस्तार किया।
- हजारों पुनर्वास विशेषज्ञों एवं विशेष शिक्षकों को प्रशिक्षित किया।
- पुनर्वास अभियांत्रिकी के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया।
- समावेशी शिक्षा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर तकनीकी सहयोग प्रदान किया।
- आधुनिक सहायक उपकरणों के विकास एवं उपयोग को बढ़ावा दिया।
- अनुसंधान एवं नवाचार के माध्यम से पुनर्वास सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार किया।
RPSC परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य
| विषय | तथ्य |
|---|---|
| आधिकारिक नाम | राष्ट्रीय चलन दिव्यांगजन संस्थान (दिव्यांगजन) |
| अंग्रेज़ी नाम | National Institute for Locomotor Disabilities (Divyangjan) |
| संक्षिप्त नाम | NILD |
| पूर्व नाम | National Institute for the Orthopaedically Handicapped (NIOH) |
| स्थापना वर्ष | 1978 |
| मुख्यालय | कोलकाता, पश्चिम बंगाल |
| प्रशासनिक नियंत्रण | दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग (DEPwD) |
| प्रमुख कार्यक्षेत्र | चलन दिव्यांगता (Locomotor Disability) |
| प्रमुख सेवाएँ | फिजियोथेरेपी, ऑक्यूपेशनल थेरेपी, प्रोस्थेटिक्स, ऑर्थोटिक्स, पुनर्वास अभियांत्रिकी, विशेष शिक्षा एवं पुनर्वास |
परीक्षा टिप:
NILD से जुड़े प्रश्नों में सामान्यतः पूर्व नाम (NIOH), वर्तमान नाम (NILD), स्थापना वर्ष (1978), मुख्यालय (कोलकाता), कार्यक्षेत्र (चलन दिव्यांगता), तथा प्रोस्थेटिक्स एवं ऑर्थोटिक्स सेवाएँ पूछी जाती हैं।
Disclaimer:
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